भ्रम

by Vivek Mishra


बचपन में पर्वत को देखकर मैं आवाज़ लगाता
था की मैं वहाँ ज़रूर पहुँचुगा. सब कहते थे की ये करेगा. आज उँचाई पर तो हूँ और आवाज़ भी लगाता हूँ, आवाज़ तो वापस सुनाई देती है पर वो लोग नही आते!

यह भर्म है या वो भ्रम था. ढूंड रहा हूँ

-​विवेक

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